कृषि की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए नई पराग (Pollen) विश्लेषण विधि

प्रश्न – निम्नलिखित में से कौन-सी फसलें पोएसी (Poaceae) परिवार से संबंधित हैं?
1. गेहूं
2. चावल
3. जौ
4. बाजरा
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2 और 4
(c) 1, 2, 3 और 4
(d) केवल 1 और 4
उत्तर – (c)


व्याख्यात्मक उत्तर

  • बीरबल साहनी पुरावनस्पतिविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों द्वारा खेती की जाने वाली फसलों और जंगली घासों के परागकणों के बीच अंतर करने की एक नई विधि विकसित की गई है, जो मध्य गंगा मैदान में कृषि की उत्पत्ति के बारे में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।
  • गेहूं, चावल, जौ और बाजरा जैसी अधिकांश अनाज फसलें पोएसी (घास) परिवार से संबंधित हैं।
  • हालांकि, इनके परागकण जंगली घासों के परागकणों से काफी मिलते-जुलते हैं, जिससे वैज्ञानिकों के लिए सूक्ष्मदर्शी से इन दोनों में अंतर करना मुश्किल हो जाता है।
  • यह सीमा लंबे समय से प्रारंभिक कृषि का पता लगाने में एक चुनौती रही है, क्योंकि परागकण तलछट में संरक्षित रहते हैं, इसलिए इनका संयोजन होलोसीन काल (पिछले 11,700 वर्ष) के दौरान कृषि, वनों की कटाई और बस्तियों के बारे में जानकारी दे सकता है।
  • भारत में अपनी तरह के पहले अध्ययन में, बीरबल साहनी पुरावनस्पतिविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने सहयोगियों के साथ मिलकर लाइट माइक्रोस्कोपी (एलएम), कॉन्फोकल लेजर स्कैनिंग माइक्रोस्कोपी (सीएलएसएम) और फील्ड एमिशन स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (एफईएसईएम) का उपयोग करके 22 अनाज और गैर-अनाज प्रजातियों का विश्लेषण किया।
  • उन्होंने मध्य गंगा मैदान पर ध्यान केंद्रित किया।
  • पत्रिका ‘द होलोसीन’ (सेज प्रकाशन) में प्रकाशित इस अध्ययन में फसल के परागकणों को जंगली किस्मों से अलग करने के लिए एक “युग्मित बायोमेट्रिक सीमा” प्रस्तुत की गई है।
  • निष्कर्षों के अनुसार, अनाज के परागकणों का आकार आमतौर पर 46 माइक्रोमीटर से अधिक और वलय व्यास 9 माइक्रोमीटर से अधिक होता है, जबकि जंगली घास के परागकण इन मानों से कम होते हैं।
  • ये निष्कर्ष मध्य गंगा मैदान के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, जो भारत के सबसे उपजाऊ और घनी आबादी वाले कृषि क्षेत्रों में से एक है।
  • यह पहली बार है जब गंगा के मैदानी क्षेत्र से प्राप्त स्वदेशी आंकड़ों का उपयोग करके इस तरह का एक अनुरूप मॉडल विकसित किया गया है, जिससे वैज्ञानिकों को यूरोपीय पराग संदर्भ डेटाबेस पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय साक्ष्यों के आधार पर क्षेत्र के कृषि इतिहास का पुनर्निर्माण करने में मदद मिलेगी।
  • इस अध्ययन का नेतृत्व लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुरावनस्पतिविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. स्वाति त्रिपाठी ने डॉ. आरती गर्ग (भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, प्रयागराज), आर्य पांडे और अनुपम शर्मा (बीएसआईपी), प्रियंका सिंह (भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान, मुंबई) और अंशिका सिंह (लखनऊ विश्वविद्यालय) के सहयोग से किया।

लेखक- विजय प्रताप सिंह

संबंधित लिंक भी देखें…

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2249305&reg=3&lang=2

https://dst.gov.in/new-study-helps-in-decoding-india%27s-farming-past-in-ganga-plain-using-grass-pollen-grains